बारिश की वो रात
वो जुलाई की शाम थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू घुली हुई थी। नेहा बस स्टॉप पर खड़ी थी, छाता भूल आई थी। तभी बारिश शुरू हो गई — पहले हल्की बूँदें, फिर मूसलाधार। वो भीगने लगी। "ये लो।" एक आवाज़ आई। उसने मुड़कर देखा — एक लड़का अपना छाता उसकी तरफ बढ़ा रहा था, खुद भीगते हुए। "अरे नहीं, आप भीग जाओगे!" नेहा ने कहा। "भीगना तो मुझे पसंद है," उसने मुस्कुराकर कहा। "लेकिन आपको सर्दी लग जाएगी।" नेहा ने छाता ले लिया। "शुक्रिया... आपका नाम?" "आदित्य।" बस आ गई। नेहा चढ़ गई, लेकिन खिड़की से उसने देखा — आदित्य अभी भी बारिश में खड़ा था, मुस्कुरा रहा था। अगले दिन वो फिर उसी बस स्टॉप पर मिले। इस बार धूप थी। नेहा ने छाता लौटाया। "कॉफी?" आदित्य ने पूछा। नेहा ने सिर हिलाया — हाँ। उस छोटी सी कॉफी शॉप में, बारिश की बातों से शुरू हुआ सिलसिला — ज़िंदगी भर की बातों तक पहुँच गया। दो अजनबी, एक छाता, और बारिश की वो रात — यही तो प्यार की शुरुआत होती है। आज दस साल बाद भी, जब बारिश होती है, आदित्य जानबूझकर छाता भूल जाता है। और नेहा हर बार मुस्कुराकर कहती है — "तुम कभी नहीं सुधरोगे।" पर दोनों जानते हैं — अगर उस रात छाता होता, तो शायद ये कहानी कभी न लिखी जाती।