चाय की दुकान पर इश्क़
रोज़ सुबह 7:30 बजे, रोहन उसी चाय की दुकान पर आता था। कड़क चाय, अदरक वाली। और रोज़ सुबह 7:35 बजे, एक लड़की आती थी — लंबे बाल, चश्मा, हाथ में किताब। वो हमेशा "एक कटिंग चाय" ऑर्डर करती थी। दो महीने — रोज़ दिखती थी, पर कभी बात नहीं हुई। रोहन बस देखता रहता। उसकी हँसी, जब वो दुकानदार से मज़ाक करती। उसका चश्मा ठीक करना। किताब के पन्ने पलटते हुए होंठों पर हल्की सी मुस्कान। एक दिन रोहन ने हिम्मत जुटाई। चाय वाले से बोला — "भैया, उस मैडम की चाय का बिल मेरी तरफ से।" चाय वाले ने मुस्कुराकर चाय भेज दी। लड़की ने हैरानी से इधर देखा। रोहन ने हाथ हिलाया। वो उठकर आई। "शुक्रिया, पर क्यों?" "दो महीने से रोज़ देखता हूँ। सोचा आज बात कर ही लूँ, वरना पूरी ज़िंदगी बस देखता रहूँगा।" वो हँसी। "मैं कविता हूँ।" "मैं रोहन। और अब से मेरी सुबह सिर्फ चाय से नहीं, कविता से शुरू होगी।" कविता ने आँखें घुमाईं, पर मुस्कुरा रही थी। उस दिन से वो रोज़ साथ बैठकर चाय पीते। दो कप — एक कड़क, एक कटिंग। दो इंसान, एक दुकान। और प्यार? वो तो चाय की भाप की तरह धीरे-धीरे उठ रहा था — गर्म, सौंधा, और दिल को छूने वाला। छह महीने बाद जब रोहन ने प्रपोज़ किया, तो कविता ने कहा — "हाँ, पर एक शर्त है।" "क्या?" "हमेशा मेरी चाय का बिल तुम दोगे।" रोहन ने हँसकर कहा — "पूरी ज़िंदगी।"