ट्रेन नंबर 12952 — दिल्ली से मुंबई
राजधानी एक्सप्रेस। सीट 47, कोच B2। मनीषा ने अपना बैग रखा और खिड़की वाली सीट पर बैठ गई। 16 घंटे का सफ़र था — दिल्ली से मुंबई। नई नौकरी, नया शहर, नई ज़िंदगी। "एक्सक्यूज़ मी, ये 48 है?" सामने वाली सीट पर एक लड़का खड़ा था। कुर्ता-जींस, बैकपैक, और एक गिटार केस। "हाँ, बैठ जाइए।" उसका नाम विवेक था। म्यूज़िशियन। मुंबई में किसी बैंड के ऑडिशन के लिए जा रहा था। पहले दो घंटे — अजीब सी चुप्पी। फिर खाना आया। विवेक ने अपनी आलू की टिक्की शेयर की। मनीषा ने अपनी गुलाब जामुन। "मुंबई पहली बार?" विवेक ने पूछा। "हाँ। डर लग रहा है थोड़ा।" "मुझे भी। पर डर में मज़ा है — मतलब कुछ नया होने वाला है।" रात हुई। ट्रेन की खटखट, बाहर अँधेरा, और अंदर दो अजनबी — जो अब अजनबी नहीं रहे थे। बातें — बचपन की, सपनों की, टूटे दिलों की, नई उम्मीदों की। "एक गाना सुनोगी?" विवेक ने पूछा। गिटार निकाला और धीमी आवाज़ में गाया — "तुम हो" फिल्म रॉकस्टार का। मनीषा की आँखें भर आईं। "बहुत अच्छा गाते हो।" "बस तुम्हारे लिए।" विवेक ने कहा — फिर हड़बड़ाकर बोला, "मतलब... इस ट्रेन में... तुम्हारे सामने... बस ऐसे ही..." मनीषा हँसी। पहली बार किसी की घबराहट इतनी प्यारी लगी। सुबह मुंबई आ गई। प्लेटफॉर्म पर दोनों खड़े थे। बैग कंधे पर, और एक अजीब सा खालीपन दिल में। "नंबर दोगी?" विवेक ने पूछा। मनीषा ने दिया। और वो पहला मैसेज — प्लेटफॉर्म पर खड़े-खड़े ही आ गया: "मुंबई अच्छी लगने लगी।" आज पाँच साल बाद, दोनों बांद्रा में एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं। दीवार पर वो गिटार टँगा है। और हर साल, उनकी सालगिरह ट्रेन नंबर 12952 में मनती है — सीट 47 और 48।