कॉफ़ी, बारिश और तुम
शिमला की सर्दियाँ। मॉल रोड पर एक छोटी सी कॉफ़ी शॉप — "हिमालयन ब्रू"। तन्वी हर साल दिसंबर में शिमला आती थी — अकेली। ये उसका रिचुअल था। दिल्ली की भागदौड़ से दूर, एक हफ़्ता सिर्फ अपने लिए। उस दिन बर्फ़ गिर रही थी। तन्वी कॉफ़ी शॉप में बैठी थी — हॉट चॉकलेट, खिड़की से बाहर सफ़ेद बर्फ़ का नज़ारा, और हाथ में डायरी। "क्या लिख रही हो?" एक आवाज़। सामने वाली टेबल पर एक लड़का बैठा था। कान पर हेडफ़ोन्स, सामने लैपटॉप। "कुछ नहीं, बस यूँ ही।" तन्वी ने कहा। "यूँ ही लिखना सबसे अच्छा होता है।" उसने मुस्कुराकर कहा। "मैं कबीर हूँ।" कबीर फ़ोटोग्राफ़र था। फ़्रीलांस। दुनिया घूमता था, तस्वीरें खींचता था। इस बार शिमला में बर्फ़ की तस्वीरें लेने आया था। दो अजनबी, एक छोटी सी कॉफ़ी शॉप, और बाहर गिरती बर्फ़। बातें शुरू हुईं और रुकने का नाम नहीं लिया। कबीर ने अपनी तस्वीरें दिखाईं — लद्दाख के तारे, केरल की बैकवॉटर्स, राजस्थान के रेत के टीले। तन्वी ने अपनी कविताएँ सुनाईं — शहर की तन्हाई पर, खोए हुए लोगों पर, उम्मीद पर। "तुम शब्दों से वो पेंट करती हो जो मैं कैमरे से करता हूँ," कबीर ने कहा। तन्वी की गालों पर लाली आ गई — और ये सर्दी की वजह से नहीं थी। पाँच दिन — हर दिन वो कॉफ़ी शॉप में मिले। बर्फ़ में साथ चले। तन्वी ने कबीर को कॉफ़ी पिलाई, कबीर ने तन्वी की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर खींची — खिड़की के पास बैठी, डायरी में लिखती हुई, बालों पर धूप। छठे दिन तन्वी को वापस जाना था। एयरपोर्ट पर कबीर ने एक प्रिंट दिया — वो तस्वीर। पीछे लिखा था: "हर दिसंबर, हिमालयन ब्रू, वही खिड़की वाली सीट। मैं आऊँगा। तुम आओगी?" तन्वी ने सिर्फ एक शब्द कहा — "हमेशा।" आज चौथा दिसंबर है। और हर साल की तरह, शिमला की उस कॉफ़ी शॉप में एक टेबल रिज़र्व्ड है — जिस पर लिखा है: "कबीर और तन्वी — हमेशा।"