मिट्टी की खुशबू और तुम
गाँव छोड़े दस साल हो गए थे। सुमित दिल्ली में IT कंपनी में काम करता था। AC ऑफ़िस, लैपटॉप, ट्रैफ़िक — यही ज़िंदगी थी। फिर माँ का फ़ोन आया — "बेटा, दादी की तबियत ठीक नहीं है।" सुमित अगली ट्रेन से गाँव पहुँचा। स्टेशन पर उतरा तो पहली चीज़ जो महसूस हुई — मिट्टी की खुशबू। बारिश के बाद वाली वो सौंधी, गीली, ज़िंदा खुशबू। दादी ठीक हो रही थीं। सुमित ने सोचा — दो-तीन दिन रुक जाता हूँ। दूसरे दिन सुबह, वो खेतों की तरफ़ टहलने गया। पगडंडी पर एक लड़की मिली — सिर पर मटका, बालों में गेंदे का फूल, और नंगे पैर। "तुम सुमित हो ना? रामलाल काका के पोते?" उसने पूछा। "हाँ... तुम?" "गीता। तुम्हारे घर के पीछे वाले खेत हमारे हैं। तुम छोटे थे तब साथ खेलते थे। याद नहीं?" सुमित को धुँधली याद आई — एक लड़की जो पेड़ पर चढ़ती थी, जो उससे तेज़ भागती थी। "तुम वो... पेड़ वाली?" गीता हँसी। "हाँ, पेड़ वाली।" वो तीन दिन, तीन हफ़्ते बन गए। गीता उसे गाँव घुमाती — वो कुआँ जहाँ बचपन में पत्थर फेंकते थे, वो आम का पेड़ जिस पर दोनों चढ़ते थे, वो मंदिर जहाँ दादी ले जाती थीं। सुमित को लगा — दस साल में वो कुछ खो चुका था। और गीता के साथ वो सब वापस मिल रहा था। एक शाम, दोनों खेत की मेड़ पर बैठे थे। सूरज डूब रहा था। आसमान नारंगी था। "तुम वापस जाओगे ना?" गीता ने पूछा। आवाज़ में उदासी थी। "जाना तो पड़ेगा।" "फिर शहर में भूल जाओगे गाँव। और मुझे भी।" सुमित ने उसका हाथ पकड़ा। "गीता, मैं शहर को भूल सकता हूँ। पर मिट्टी की खुशबू कैसे भूलूँगा? और तुम तो उस खुशबू से भी ज़्यादा अच्छी हो।" गीता की आँखें भर आईं। "बहुत शहरी बातें सीख लीं तुमने।" "ये शहरी नहीं, ये दिल की बात है।" सुमित ने दिल्ली की नौकरी छोड़ दी। गाँव में रहकर ऑनलाइन काम शुरू किया। शादी हुई — गीता से। मंदिर में, बैंड-बाजे के साथ। आज भी हर शाम, दोनों उसी मेड़ पर बैठते हैं। सूरज वैसे ही डूबता है। पर अब गीता नहीं पूछती — "वापस जाओगे?" क्योंकि वो जानती है — सुमित घर आ चुका है।