दो शहर, एक धड़कन
लखनऊ और बैंगलोर — 2000 किलोमीटर। आयुष लखनऊ में था — UPSC की तैयारी। तान्या बैंगलोर में — स्टार्टअप में काम करती थी। दोनों कॉलेज में साथ थे, फिर ज़िंदगी ने अलग रास्तों पर भेज दिया। ब्रेकअप नहीं हुआ था — बस "देखते हैं" पर छूटा था। दो साल बीते। एक रात, आयुष का फ़ोन बजा — तान्या। "सो रहे हो?" "नहीं, पढ़ रहा था। तुम?" "मुझे नींद नहीं आ रही।" "क्यों?" "पता नहीं। बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।" उस रात फ़ोन तीन घंटे चला। अगली रात भी। फिर अगली भी। रोज़ रात 11 बजे — जैसे कोई अनकही ड्यूटी हो। दोनों बात करते — पढ़ाई, ऑफ़िस, खाना, मौसम, सपने, डर, अकेलापन। सब कुछ। एक रात तान्या ने कहा — "आयुष, हम क्या कर रहे हैं? रोज़ बात करते हैं, पर ना तुम यहाँ हो ना मैं वहाँ।" "तो क्या बात करना बंद कर दें?" "नहीं! बस... ये अधूरापन तकलीफ़ देता है।" "तान्या, मैं UPSC निकालूँगा। पोस्टिंग कहीं भी हो — मैं तुम्हें लेने आऊँगा। बस एक साल और।" "प्रॉमिस?" "प्रॉमिस।" वो एक साल सबसे मुश्किल था। 16-16 घंटे पढ़ाई। तान्या रात को कॉल करती, आयुष की आँखें बंद हो जातीं, पर वो फ़ोन नहीं काटती — बस सुनती रहती उसकी साँसों की आवाज़। रिज़ल्ट आया — आयुष सिलेक्ट हो गया। IAS। पहला कॉल — तान्या को। "निकल गया।" तान्या रोने लगी। ख़ुशी के आँसू। ट्रेनिंग मसूरी में थी। पहली छुट्टी मिली तो आयुष सीधे बैंगलोर गया। एयरपोर्ट पर तान्या खड़ी थी। दो साल बाद — पहली बार सामने। आयुष ने उसे गले लगाया। बस यही चाहिए था — सब कुछ ठीक हो गया। "अब कभी देखते हैं नहीं बोलना," तान्या ने कहा। "अब कहीं जाना ही नहीं है," आयुष ने जवाब दिया।