Art Gallery में ख़ामोश इश्क़
Mumbai के Kala Ghoda festival में एक छोटी सी art gallery। अंदर — abstract paintings। रंग बिखरे हुए, मतलब छुपे हुए। मैं एक painting के सामने खड़ा था — लाल और नीले रंगों का मिश्रण। समझ नहीं आ रहा था। बगल में एक लड़की — ख़ामोशी से उसी painting को देख रही थी। पाँच मिनट। दस मिनट। बिना हिले। "Tumhe samajh aa rahi hai?" मैंने आख़िर पूछा। उसने मुड़कर देखा। "नहीं। पर इसीलिए तो देख रही हूँ। जो समझ आ जाए — उसे देखने में मज़ा कहाँ?" वो बात — वो एक बात — मेरे अंदर कहीं गहरे उतर गई। "मैं आकाश।" "तन्वी।" हम साथ gallery घूमे। हर painting के सामने रुके। कोई explain नहीं करता था — बस feel करते थे। कभी-कभी एक दूसरे को देखकर मुस्कुराते — "यह वाली अच्छी है" बस इशारे से। Gallery ख़त्म हुई। बाहर — Kala Ghoda की गलियाँ, street food, भीड़। "Chai?" मैंने पूछा। "Cutting," उसने कहा। Tapri पर chai पी। बातें — art से ज़िन्दगी तक। वो sculptor थी। मिट्टी से चेहरे बनाती थी — "जो लोग मिले, उनके चेहरे। Memory से।" "मेरा बनाओगी?" मैंने मज़ाक में कहा। "पहले याद तो रहने दो," उसने आँख मारी। उस शाम phone exchange हुआ। अगले हफ़्ते — उसके studio में गया। छोटा सा कमरा, चारों तरफ़ मिट्टी के sculptures। और एक अधूरा चेहरा — जो familiar लगा। "यह..." "तुम्हारा है," उसने कहा। "Gallery वाले दिन से बना रही हूँ। याद रह गया चेहरा।" मैं कुछ नहीं बोल पाया। बस देखता रहा — मिट्टी का वो चेहरा, उसके हाथों की छुअन, और studio की ख़ामोशी। कुछ कहानियाँ शब्दों से नहीं — मिट्टी और रंगों से शुरू होती हैं।