मेट्रो में मुलाक़ात
दिल्ली मेट्रो। ब्लू लाइन। सुबह 9 बजे की भीड़। आयशा हर रोज़ राजीव चौक से गुड़गाँव जाती थी। हेडफ़ोन्स लगाए, दुनिया से कटी हुई। उसके लिए मेट्रो बस एक ज़रिया था — ऑफ़िस पहुँचने का। पर पिछले हफ़्ते से कुछ बदला था। हर रोज़ वही लड़का — सामने वाली सीट पर, नीली शर्ट, हाथ में एक diary। वो कुछ लिखता रहता — कभी मुस्कुराते हुए, कभी सोचते हुए। आयशा ने नोटिस किया — वो कभी फ़ोन नहीं देखता। बस diary और खिड़की। एक दिन मेट्रो अचानक रुकी — technical fault। सब परेशान, फ़ोन निकाले। पर वो लड़का शांत था, लिख रहा था। "क्या लिखते हो?" आयशा ने हेडफ़ोन्स उतारकर पूछा — ख़ुद को हैरान करते हुए। उसने सिर उठाया। "कहानियाँ। जो मेट्रो में दिखती हैं।" "जैसी?" "जैसे — एक लड़की जो हर रोज़ ठीक 9:07 पर चढ़ती है, हमेशा तीसरे दरवाज़े से, हेडफ़ोन्स में Arijit Singh सुनती है — क्योंकि मुझे lip-sync दिख जाता है।" आयशा की साँस रुक गई। "तुमने मुझे notice किया?" "कहानीकार हूँ। सब notice करता हूँ।" उसने मुस्कुराकर कहा। "मेरा नाम विराट है।" मेट्रो चली। पर उस दिन आयशा ने हेडफ़ोन्स वापस नहीं लगाए। अगले तीन हफ़्ते — हर सुबह 40 मिनट का सफ़र, बातों में कट जाता। विराट ने आयशा को अपनी diary दिखाई — उसमें छोटी-छोटी sketches थीं, मेट्रो के लोगों की। एक sketch में वो लड़की थी — हेडफ़ोन्स, खिड़की से बाहर देखती हुई। नीचे लिखा था: "रोज़ का सबसे ख़ूबसूरत पल।" आयशा ने वो page फाड़ लिया। "अरे वो मेरी—" "अब मेरी है।" आज दोनों साथ मेट्रो पकड़ते हैं। एक ही हेडफ़ोन — एक earpiece आयशा के कान में, एक विराट के। और diary में अब दोनों की कहानी लिखी जाती है।