बनारस की गलियों में इश्क़
बनारस। अस्सी घाट। सुबह की आरती की गूँज। तारा हर साल दिवाली पर बनारस आती थी — नानी के घर। उसके लिए बनारस का मतलब था — गंगा, मलाईयो, और नानी की कहानियाँ। इस बार कुछ अलग था। अस्सी घाट पर बैठकर वो sketch बना रही थी — गंगा का, दीयों का। तभी एक आवाज़ आई: "तुम्हारी गंगा में रंग कम है।" तारा ने मुड़कर देखा। एक लड़का — कुर्ता-पायजामा, माथे पर तिलक, हाथ में चाय का कुल्हड़। "माफ़ कीजिए?" "गंगा सिर्फ़ नीली नहीं है। सुबह सुनहरी होती है, शाम को नारंगी, और रात को — रात को गंगा चाँदी हो जाती है।" उसने बैठते हुए कहा। "मैं ओम हूँ। बनारस का हूँ।" "तारा। दिल्ली से।" ओम ने कुल्हड़ बढ़ाया। "बनारस की चाय पी? बिना इसके बनारस अधूरा है।" अगले पाँच दिन ओम ने तारा को वो बनारस दिखाया जो guidebooks में नहीं मिलता। गलियों में छुपी 300 साल पुरानी मिठाई की दुकान। गंगा के उस पार का सूनसान किनारा जहाँ शाम को बस पक्षियों की आवाज़ सुनाई देती है। एक छोटा सा मंदिर जहाँ दीवारों पर कविताएँ लिखी हैं। "तुम बनारस से इतना प्यार क्यों करते हो?" तारा ने पूछा। "क्योंकि बनारस ने मुझे सिखाया — ज़िंदगी बहती रहती है, गंगा की तरह। रुकना मत, बस बहते रहो।" आख़िरी शाम, गंगा आरती के वक़्त, तारा ने एक दीया बहाया। ओम ने पूछा — "क्या माँगा?" "कि अगली दिवाली भी यहीं बिताऊँ।" ओम मुस्कुराया। "गंगा ने सुन लिया। अब तुम्हें आना पड़ेगा।" तारा हर दिवाली आती है। और हर बार, अस्सी घाट पर एक कुल्हड़ चाय उसका इंतज़ार करती है — ओम के हाथ में। तारा का sketch अब पूरा है। गंगा में सारे रंग हैं — सुनहरा, नारंगी, चाँदी। और एक रंग जो ओम ने नहीं बताया था — प्यार का रंग। वो तो ख़ुद तारा ने भर दिया।