ऑनलाइन से ऑफ़लाइन
शुरुआत एक book review से हुई। Instagram पर किसी ने "The Alchemist" का एक quote शेयर किया था। Comment section में बहस छिड़ गई — "overrated है" vs "life-changing है।" नेहा ने लिखा: "Overrated कहने वालों ने शायद ग़लत वक़्त पर पढ़ी।" Reply आया एक अजनबी से — @kabir_reads: "या शायद सही वक़्त पर पढ़ने वालों ने उसमें वो ढूँढ लिया जो उन्हें चाहिए था।" नेहा ने profile खोली। Book reviews, poetry, और शिमला की तस्वीरें। DM भेजा: "तुम्हारी book list impressive है।" Reply: "तुम्हारी comment impressive थी।" तीन महीने — रोज़ DM। सुबह की चाय की फ़ोटो, रात को book recommendations, बीच में ज़िंदगी की बातें। नेहा मुंबई में थी, कबीर शिमला में। कभी video call नहीं किया। कभी voice note नहीं भेजा। सिर्फ़ शब्द। जैसे दो लोग ख़त लिख रहे हों — digital ज़माने में। एक दिन कबीर ने लिखा: "मैं मुंबई आ रहा हूँ। 12 तारीख़ को। मिलोगी?" नेहा का दिल धड़का। तीन महीने की बातें, पर असल में कभी मिले नहीं। "हाँ।" 12 तारीख़। Bandstand पर। शाम 5 बजे। नेहा पहुँची — हाथ में "The Alchemist" पकड़े, जैसा दोनों ने तय किया था identification के लिए। सामने से एक लड़का आया — हाथ में वही किताब। चश्मा, कुर्ता, और एक nervous सी मुस्कान। "नेहा?" "कबीर?" दोनों हँसे। और फिर एक अजीब सी ख़ामोशी — तीन महीने रोज़ बात करने के बाद, सामने खड़े होकर कुछ नहीं सूझ रहा था। कबीर ने कहा: "चाय?" नेहा हँसी: "बस यही बोलना था?" "तीन महीने message किया, अब real में starting trouble हो रहा है।" चाय पीते-पीते वो starting trouble ख़त्म हो गया। और जो शुरू हुआ वो आज तक जारी है। अब दोनों शिमला में रहते हैं। घर में एक पूरी shelf किताबों से भरी है। और हर साल, 12 तारीख़ को, Bandstand की तस्वीर Instagram पर डालते हैं — caption: "जहाँ overrated किताब ने underrated ज़िंदगी बदल दी।"