अधूरा ख़त
प्रिय अंशु, ये ख़त मैं कभी भेज नहीं पाऊँगा। पर लिखना ज़रूरी था। याद है वो दिन? दसवीं की परीक्षा का आखिरी दिन। सब लोग खुश थे कि छुट्टियाँ शुरू हो रहीं हैं। पर मैं उदास था — क्योंकि छुट्टियाँ मतलब तुम्हें रोज़ न देख पाना। तुम स्कूल के गेट पर खड़ी थीं। सफ़ेद सलवार कमीज़, बालों में चमेली का फूल। मैंने सोचा था — आज कह दूँगा। आज बता दूँगा कि तीन साल से हर सुबह स्कूल इसलिए अच्छी लगती है क्योंकि तुम दिखती हो। पर जब तुम्हारे पास पहुँचा, तो बस इतना कह पाया — "हैप्पी वेकेशन।" तुमने हँसकर कहा — "तुम भी। मिलते रहेंगे ना?" मैंने "हाँ" कहा। पर हम कभी नहीं मिले। तुम्हारे पापा का ट्रांसफर हो गया। पता भी नहीं चला कब। बीस साल हो गए। मैं आज भी कभी-कभी वो पुरानी गली से गुज़रता हूँ। तुम्हारा घर अब किसी और का है। दीवारें नई हैं। पर मुझे अभी भी वो पुरानी खिड़की दिखती है — जहाँ तुम शाम को बैठकर पढ़ती थीं, और मैं नीचे से गुज़रते हुए ऊपर देखता था। लोग कहते हैं पहला प्यार भूल जाता है। झूठ बोलते हैं। पहला प्यार कहीं नहीं जाता — वो बस एक कोने में बैठ जाता है, चुपचाप, और कभी-कभी बारिश में, या किसी पुराने गाने में, या चमेली की खुशबू में — जाग जाता है। तुम ख़ुश रहो, अंशु। जहाँ भी हो। हमेशा तुम्हारा, वो लड़का जो कभी कुछ कह नहीं पाया