बूढ़े दादा का ख़त — दादी को
मेरी प्यारी कमला, आज 50 साल हो गए हमारी शादी को। सोचा था केक लाऊँगा, पर बाज़ार जाने में अब घुटने साथ नहीं देते। तो ये ख़त ही सही। 50 साल। याद है? तेरे बाबा ने मुझे देखकर कहा था — "लड़का कमज़ोर है, ये लड़की को ख़ुश रख पाएगा?" तूने क्या जवाब दिया था? "बाबा, कमज़ोर तो पूछती ही नहीं।" और बस, शादी तय हो गई। कमला, तूने मुझे बनाया है। वो ग़रीबी — जब एक कमरे में सब रहते थे, बच्चे फ़र्श पर सोते थे। तूने कभी शिकायत नहीं की। बस कहती — "पेट भरा है, छत है, तुम हो — क्या कम है?" वो दिन जब मैं नौकरी से निकाला गया — मैं टूट गया था। घर आकर रोया। तूने चाय बनाई, मेरे सामने रखी, और बोली — "रो लो। फिर कल से नई शुरुआत।" अगले दिन मैंने अपनी दुकान खोली — जो आज बेटे चला रहे हैं। कमला, मैं बहुत रोमांटिक आदमी नहीं रहा। कभी गुलाब नहीं दिए, कभी "I love you" नहीं बोला। पर आज बोलता हूँ — ज़िंदगी में जो कुछ अच्छा है, वो तेरी वजह से है। अब उम्र हो गई। दवाइयाँ बढ़ गईं। आँखें कमज़ोर हैं। पर एक चीज़ अभी भी वैसी है — जब तू सुबह मंदिर से लौटकर आती है, माथे पर सिंदूर, हाथ में प्रसाद, और मुस्कुराती हुई — मेरा दिल अभी भी वैसे ही धड़कता है जैसे 50 साल पहले धड़कता था। तू मेरी ज़िंदगी है। थी, है, और रहेगी। तेरा बूढ़ा, रामप्रसाद P.S. — शाम को खीर बना दे। तेरे हाथ की खीर से अच्छा कोई केक नहीं।