इश्क़ की ग़ज़ल
तेरी गली से गुज़रता हूँ तो याद आता है, वो वक़्त जब दिल ख़ुशी से आबाद आता है। तेरी नज़र जो मिली थी उस भीड़ में कभी, अब हर चेहरे में बस तेरा चेहरा नज़र आता है। ख़ामोश रातों में तेरी आवाज़ सुनता हूँ, हवाओं में तेरा ज़िक्र बार-बार आता है। मैंने छुपाया था इश्क़ सबसे ऐ दोस्त, पर तेरा नाम ज़ुबान पर बेइख़्तियार आता है। तू कहती है भूल जा, ये मुमकिन नहीं, जो दिल में बस गया हो वो कहाँ बाहर आता है। कभी मिलोगी तो कहूँगा ये बात ऐ जाँ, तेरे बिना हर ख़ुशी में भी ग़म का अहसास आता है। बहुत दूर हो तुम मगर दिल के क़रीब हो, ये इश्क़ है — दूरियों में भी अपना पास आता है। ग़ज़ल ख़त्म होती है पर बात ख़त्म नहीं, तू जब भी याद आती है, ये दिल बेक़रार आता है।