इश्क़ का दस्तूर — ग़ज़ल
मोहब्बत का कोई दस्तूर होता नहीं, दिल जिसे चाहे उसका क़ुसूर होता नहीं। वो मिले तो ज़माना हसीन लगता है, उनके बिना कोई दिन पूर होता नहीं। उनकी यादों का साया है हर तरफ़, ऐसा कोना जहाँ उनका नूर होता नहीं। कहते हैं वक़्त सब ज़ख़्म भर देता है, पर इश्क़ का ज़ख़्म कभी दूर होता नहीं। मैंने चाहा कि भूल जाऊँ उन्हें, पर ये दिल है — कहा मानता ये मजबूर होता नहीं। उनकी एक झलक पर सब लुटा देते हैं, ये दीवानगी है, यहाँ शऊर होता नहीं। जो मिला प्यार में वो कहीं और मिला नहीं, ये दौलत है जिसका कोई सूर होता नहीं। इश्क़ में हम ने जो खोया वो पाया भी है, ये सौदा है जिसमें कोई ग़रूर होता नहीं।