सात समंदर पार से — एक पत्र
प्रिय रोहित, लंदन से लिख रही हूँ। यहाँ शाम के 6 बज रहे हैं, मतलब तुम्हारे वहाँ रात के 11:30। शायद अभी तुम बालकनी में खड़े होकर चाय पी रहे होगे — वो तुम्हारी आदत है जो मुझे सबसे ज़्यादा याद आती है। आज ऑफ़िस से लौटते वक़्त बारिश हो रही थी। लंदन में बारिश कोई ख़ास बात नहीं — रोज़ होती है। पर आज अचानक मुंबई की बारिश याद आ गई। वो मरीन ड्राइव, वो भुट्टा, और तुम्हारा वो बेवकूफ़ी भरा डांस। मुझे याद है — हम भीग रहे थे और तुमने कहा था, "बारिश इसलिए होती है ताकि हम रो सकें और किसी को पता न चले।" मैंने पूछा, "तुम रो रहे हो?" तुमने कहा, "नहीं, पर अगर कभी रोऊँ तो तुम्हारे सामने ही रोऊँगा।" रोहित, यहाँ सब कुछ है — अच्छी नौकरी, अच्छी तनख़्वाह, ख़ूबसूरत शहर। पर तुम नहीं हो। और तुम्हारे बिना ये सब अधूरा लगता है। जैसे किसी ने आधी तस्वीर बना दी हो — रंग सब सही हैं, पर कुछ ग़ायब है। कल एक Indian restaurant में खाना खाया। दाल-चावल ऑर्डर किए। एक कौर खाया और आँखें भर आईं — क्योंकि स्वाद तुम्हारे हाथ की दाल जैसा बिल्कुल नहीं था। तुम हँसोगे — "मेरी दाल में क्या ख़ास है?" ख़ास ये है कि वो तुम बनाते हो, मेरे लिए, प्यार से। बस 4 महीने और। फिर मैं वापस आ रही हूँ। हमेशा के लिए। ये प्रमोशन मैंने ठुकरा दिया — हाँ, वो वाला जिसके लिए मैं यहाँ आई थी। क्योंकि कोई प्रमोशन तुम्हारी जगह नहीं ले सकता। तुम्हें बहुत, बहुत, बहुत प्यार करती हूँ। इतना कि 7 समंदर भी कम पड़ जाएँ। जल्दी मिलती हूँ। हमेशा तुम्हारी, नैना P.S. — वो नीली शर्ट पहनकर एयरपोर्ट आना। मुझे वो सबसे ज़्यादा पसंद है।