बिन कहे — एक ख़त जो कभी दिया नहीं
प्रिय अनामिका, तुम्हें ये ख़त कभी नहीं मिलेगा। ये मेरी डायरी में रहेगा — उसी पन्ने के पास जहाँ तुम्हारे बालों से गिरा वो सूखा फूल रखा है। हम दोस्त हैं — बेस्ट फ़्रेंड्स। और मुझे डर है कि अगर मैंने कुछ कहा, तो ये दोस्ती ख़त्म हो जाएगी। और तुम्हें खोना — वो मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। पर कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है। जब तुम मेरे कंधे पर सिर रखकर रोती हो — मैं तुम्हें सँभालता हूँ, पर अंदर से टूट रहा होता हूँ। क्योंकि तुम किसी और के लिए रो रही होती हो। जब तुम कहती हो — "तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है" — मैं मुस्कुराता हूँ। पर वो "दोस्त" शब्द काँटे की तरह चुभता है। जब तुम पूछती हो — "मुझे कैसा लड़का मिलेगा?" — मैं कहना चाहता हूँ, "मेरे जैसा।" पर कहता हूँ, "तुझे जो ख़ुश रखे वो।" अनामिका, प्यार सिर्फ़ पाना नहीं होता। कभी-कभी प्यार ये भी होता है — चुप रहना, दूर रहना, और ये दुआ करना कि जो भी तुम्हारे हिस्से में आए, वो तुम्हें उतना प्यार करे जितना मैं करता हूँ। तुम ख़ुश रहो। बस इतना काफ़ी है। तुम्हारा दोस्त (सिर्फ़ दोस्त), राहुल