एक सैनिक का प्रेम पत्र
प्रिय सुनंदा, सियाचिन से लिख रहा हूँ। यहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ है — जहाँ तक नज़र जाए। तापमान माइनस 40। उँगलियाँ सुन्न हैं, पर ये ख़त लिखना ज़रूरी था। क्योंकि कल तुम्हारा जन्मदिन है — और मैं वहाँ नहीं हूँ। पिछले तीन जन्मदिन मैंने मिस किए। पहले ट्रेनिंग, फिर पोस्टिंग, अब ये। तुम कभी शिकायत नहीं करती — पर मैं जानता हूँ कि तुम अंदर से तोड़ती हो। माँ ने बताया — पिछली बार तुम रात भर जागी थीं, फ़ोन हाथ में लिए, कि शायद मेरा कॉल आ जाए। सुनंदा, मैं तुमसे वादा करता हूँ — अगला जन्मदिन साथ। चाहे कुछ भी हो। तुम्हें वो ड्रेस दिलाऊँगा जो तुमने ऑनलाइन दिखाई थी। वो वाली — लाल, फूलों वाली। यहाँ रात को जब ड्यूटी पर खड़ा होता हूँ — तारे बहुत क़रीब दिखते हैं। इतने क़रीब कि लगता है हाथ बढ़ाकर छू लूँ। पर मैं तारे नहीं देखता — मैं तुम्हारा चेहरा देखता हूँ। वो वाला — जब तुम सुबह उठती हो, बाल बिखरे, आँखें अधखुली, और कहती हो "पाँच मिनट और।" सुनंदा, लोग कहते हैं सैनिक बहादुर होते हैं। ग़लत। मैं बहादुर नहीं हूँ — मैं डरता हूँ। हर दिन। पर तुम्हारी एक फ़ोटो देखता हूँ और हिम्मत आ जाती है। तुम मेरी ताक़त हो। जन्मदिन मुबारक, मेरी जान। ये ख़त शायद देर से पहुँचे — यहाँ पोस्ट हफ़्ते में एक बार जाती है। पर मेरा प्यार तुम तक हमेशा पहुँचता है — बिना किसी पोस्ट के। तुम्हारा, कैप्टन विक्रम P.S. — चिंता मत करना। मैं ठीक हूँ। सही में।