बस नंबर 42
DTC बस नंबर 42 — दिल्ली गेट से नॉर्थ कैंपस। आस्था रोज़ सुबह 8:15 की बस पकड़ती थी। और रोज़ उसी बस में एक लड़का होता — हमेशा पीछे वाली सीट, कानों में earphones, और खिड़की से बाहर देखता हुआ। दो महीने — रोज़ देखती, पर कभी बात नहीं हुई। एक दिन बस बहुत भरी हुई थी। आस्था को सीट नहीं मिली। वो लड़का उठकर खड़ा हो गया और इशारे से सीट दे दी। "थैंक्यू," आस्था ने कहा। उसने बस मुस्कुरा दिया। Earphones फिर लगा लिए। अगले दिन, आस्था जानबूझकर उसकी सीट के पास गई। "कल का शुक्रिया।" "कोई बात नहीं।" "हमेशा यही बस?" "हाँ। DU?" "हाँ, हिंदू कॉलेज। तुम?" "हंसराज।" बस इतनी बात। पर अगले दिन से — रोज़ बस में 10 मिनट की बात। सिर्फ़ 10 मिनट — बस स्टॉप से कॉलेज तक। पर वो 10 मिनट आस्था के दिन की सबसे ख़ूबसूरत 10 मिनट बन गए। उसका नाम अभय था। इकॉनॉमिक्स पढ़ता था। UPSC की तैयारी कर रहा था। सीरियस था, फ़ोकस्ड था। पर बस में — बस आस्था से बात करते हुए — थोड़ा ख़ुलता था। छह महीने बीते। एक दिन अभय बस में नहीं था। दूसरे दिन भी नहीं। तीसरे दिन भी नहीं। एक हफ़्ता। आस्था को उसका नंबर नहीं पता था। कोई सोशल मीडिया नहीं। दसवें दिन, आस्था हंसराज कॉलेज गई — पूछने। गार्ड ने बताया, "अभय? वो तो पिछले हफ़्ते से बीमार है।" आस्था को उसका एड्रेस किसी क्लासमेट से मिला। वो उसके PG पर गई। अभय बुख़ार में था। "तुम? यहाँ कैसे?" अभय ने कमज़ोर आवाज़ में पूछा। "10 दिन बस में तुम्हारे बिना — बहुत लंबा सफ़र लगता है।" अभय हँसा — फिर खाँसा। आस्था ने खिचड़ी बनाई, दवाई दिलाई, दो घंटे बैठी रही। जाते वक़्त अभय ने कहा — "आस्था, तुम्हें बताना चाहता हूँ — मैं बस इसलिए 8:15 वाली पकड़ता हूँ क्योंकि तुम उसमें होती हो।" "मुझे पता है," आस्था ने कहा। "मैं भी।" आज दोनों दिल्ली में ही हैं। अभय IAS बन गया। आस्था जर्नलिस्ट है। और 42 नंबर बस? अभी भी चलती है। दोनों कभी-कभी बस उसमें बैठ जाते हैं — पुराने दिनों के लिए।