लास्ट बेंच लव
प्रोफ़ेसर शर्मा की इकॉनॉमिक्स क्लास — सुबह 9 बजे। पूरे कॉलेज की सबसे बोरिंग क्लास। करन हमेशा लास्ट बेंच पर बैठता — सोने के लिए। उसके बग़ल में हमेशा एक सीट ख़ाली रहती। एक दिन वो ख़ाली सीट भर गई। "यहाँ कोई बैठता है?" एक लड़की ने पूछा। करन ने नींद भरी आँखों से देखा। "नहीं, बैठ जाओ।" वो बैठ गई। करन फिर सोने लगा। पाँच मिनट बाद — एक कोहनी उसकी बाज़ू में लगी। "सो मत। प्रोफ़ेसर देख लेंगे।" "वो भी सो रहे हैं," करन ने कहा। वो हँसी — धीमे से, ताकि किसी को सुनाई न दे। वो हँसी करन की नींद उड़ा गई। उसका नाम श्रुति था। टॉपर। फ़्रंट बेंच वाली। पर उस दिन देर हो गई थी तो पीछे बैठना पड़ा। "तुम हमेशा पीछे क्यों बैठते हो?" श्रुति ने पूछा। "क्योंकि आगे से बोर्ड दिखता है। मुझे नहीं देखना।" "तो कॉलेज क्यों आते हो?" करन ने सोचा। "अभी तक कोई वजह नहीं थी।" श्रुति ने आँखें घुमाईं। "होपलेस हो तुम।" पर अगले दिन — श्रुति फिर लास्ट बेंच पर आई। "आज भी देर हो गई?" करन ने पूछा। "नहीं। बस... यहाँ AC की हवा अच्छी आती है।" करन समझ गया। मुस्कुराया। रोज़ — लास्ट बेंच, साथ। श्रुति नोट्स लिखती, करन कॉपी करता। श्रुति समझाती, करन सुनता। पहली बार उसे इकॉनॉमिक्स interesting लगने लगी — या शायद इकॉनॉमिक्स नहीं, बस वो आवाज़ जो समझा रही थी। सेमेस्टर एक्ज़ाम में करन ने पहली बार 70% से ज़्यादा मार्क्स लाए। श्रुति ने गले लगाया — बिना सोचे, भीड़ के बीच। "मुझ पर ज़्यादा ख़ुश मत हो," करन ने कहा। "अपने आप पर ख़ुश हूँ — मैंने एक होपलेस केस को ठीक कर दिया।" "ठीक नहीं — बदल दिया। पूरा।" आज करन MBA कर रहा है। लास्ट बेंच छोड़ दी — अब फ़्रंट रो में बैठता है। पर एक शर्त है — बग़ल वाली सीट हमेशा श्रुति के लिए रिज़र्व्ड।