ट्रेन नंबर 12952
राजधानी एक्सप्रेस में सीट 47 और 48। वो खिड़की वाली सीट पर बैठी थी, मैं बीच वाली पर। 16 घंटे का सफ़र था। पहले 2 घंटे -- ख़ामोशी। फिर उसने पूछा, 'चाय लोगे?' मैंने कहा, 'सिर्फ़ तभी जब तुम भी लो।' 16 घंटों में हमने ज़िन्दगी की कहानी सुनाई एक-दूसरे को। उसका तलाक़ हो रहा था। मेरी माँ गुज़र चुकी थी। दो टूटे हुए इंसान, एक चलती ट्रेन में। दिल्ली आ गई। प्लेटफ़ॉर्म पर उतरे। उसने कहा, 'नंबर दोगे?' मैंने कहा, 'नहीं। कुछ मुलाक़ातें एक ही बार होनी चाहिए। ताकि वो हमेशा ख़ूबसूरत रहें।' वो मुस्कुराई। आँखें नम थीं। मुड़ी और भीड़ में गुम हो गई। मैं आज भी राजधानी से सफ़र करता हूँ। सीट 47 कभी ख़ाली नहीं मिली।