दो कप चाय और अधूरी बात
सुधीर हर शाम छह बजे उसी बेंच पर बैठता था — लोधी गार्डन में, पुराने बरगद के नीचे। दो कप चाय लाता — एक अपने लिए, एक ख़ाली बेंच के लिए। लोग सोचते पागल है। शायद था भी। चार साल पहले इसी बेंच पर रितु से मिला था। वो अपनी painting का easel लगाकर बैठी थी — शाम के आसमान को canvas पर उतार रही थी। सुधीर ने पूछा, "क्या बना रही हो?" "जो दिख रहा है," उसने कहा, "और जो नहीं दिख रहा, वो भी।" बात यहीं से शुरू हुई। रोज़ मिलना, रोज़ बातें, रोज़ दो कप चाय। रितु हमेशा कहती — "तुम चाय बहुत गर्म लाते हो। ज़रा ठंडी होने दो।" और सुधीर कहता — "तुम painting बहुत धीरे करती हो। ज़रा जल्दी करो।" दोनों ने कभी "I love you" नहीं कहा। ज़रूरत नहीं पड़ी। प्यार शब्दों से नहीं, चाय की भाप में, canvas के रंगों में, शाम की हवा में बहता था। फिर एक दिन रितु ने कहा — "मुझे जाना होगा। पापा बीमार हैं। गाँव जाना है।" "कब तक?" "पता नहीं।" सुधीर ने कुछ नहीं कहा। बस दो कप चाय लाया। दोनों ने चुपचाप पी। रितु गई। महीने बीते। फिर साल। Phone नंबर बदल गया। पता नहीं चला। कोई social media नहीं — रितु कहती थी, "असली दुनिया काफ़ी है।" सुधीर आज भी दो कप चाय लाता है। बाईं तरफ़ वाला कप ठंडा हो जाता है। हमेशा। और वो बस बैठा रहता है — उस अधूरी बात का इंतज़ार करता, जो कभी कही ही नहीं गई।