वो आख़िरी चिट्ठी
दादी के संदूक से एक पुरानी चिट्ठी मिली। पीली पड़ चुकी थी। स्याही धुँधली हो गई थी। पर शब्द — शब्द आज भी ज़िंदा थे। "प्रिय कमला, जब यह चिट्ठी तुम्हें मिले, तो शायद मैं बहुत दूर होऊँ। सीमा पर हालात ख़राब हैं। कल सुबह हम आगे बढ़ रहे हैं। लौटूँगा या नहीं — यह ऊपर वाला जाने। पर एक बात पक्की है — अगर मैं नहीं लौटा, तो तुम रोना मत। मुझे वो हँसता चेहरा याद रखना जो मेने बनारस के घाट पर पहली बार देखा था। वो चेहरा जिसने मुझे सिखाया कि ज़िन्दगी जीने के लिए होती है, बस गुज़ारने के लिए नहीं। तुम्हारे हाथ की दाल अभी भी याद है — थोड़ी ज़्यादा नमकीन, पर दुनिया की सबसे अच्छी। बच्चों को बताना कि पापा को उनकी हँसी सबसे ज़्यादा पसंद थी। कमला, तुम मेरी ज़िन्दगी की सबसे ख़ूबसूरत कहानी हो। अगर अगला जनम होता है, तो बस इतना चाहूँगा कि फिर वही घाट हो, फिर वही शाम हो, और फिर तुम हो। तुम्हारा हमेशा, रामप्रसाद" दादी ने यह चिट्ठी कभी नहीं खोली थी। संदूक में सील बंद पड़ी थी — 1971 से। दादा कभी नहीं लौटे। और दादी ने पूरी ज़िन्दगी वो दाल बनाई — थोड़ी ज़्यादा नमकीन — जैसे किसी की याद में नमक हमेशा ज़्यादा ही पड़ता है।