अप्रैल की बारिश — ग़ज़ल
अप्रैल की बारिश में भीगा है ये शहर आज, तेरी याद की बूँदें गिरी हैं बेहिसाब आज। वो गली जहाँ कभी साथ चले थे हम दोनों, उन दीवारों ने भी पहना है नक़ाब आज। तू कहती थी बारिश में चलना रोमांटिक है, मैं अकेला भीग रहा हूँ, कौन करे ख़्वाब आज? मेघों ने जो बरसात की है इस अप्रैल में, लगता है मेरी आँखों से चुराया है आब आज। कॉफ़ी ठंडी हो गई खिड़की के पास रखी, तेरे बिना गरमाहट ढूँढना है बेख़्वाब आज। कहते हैं अप्रैल नई शुरुआत लाता है, पर मैं वही पुरानी कहानी दोहराता हूँ आज। बस इतनी गुज़ारिश है ऐ अप्रैल की बारिश, उसके शहर में भी बरसना, कर दे ग़ुलाब आज।