प्रिय अजनबी — तुम्हें ये कभी नहीं पढ़ना था
प्रिय अजनबी, तुम मुझे नहीं जानते। या शायद जानते हो — बस याद नहीं। पिछले महीने airport पर, Gate 14A, देरी की घोषणा के बाद जब सब चिढ़े हुए थे — तुम चुपचाप बैठकर किताब पढ़ रहे थे। तुम्हारे बग़ल की seat ख़ाली थी। मैं वहाँ बैठ गई। तीन घंटे की delay। तुमने एक बार भी phone नहीं देखा। मुझे ये इतना unusual लगा कि मैंने पूछ लिया — "कौन सी किताब है?" तुमने cover दिखाया — "Ikigai"। फिर कहा — "पर असल सवाल ये है कि तुम्हारी flight भी late है, तो तुम क्या कर रही हो?" "तुमसे बात।" तुम हँसे। और उस हँसी ने — I don't know how to explain this — पर उस हँसी ने मेरे अंदर कुछ हिलाया। तीन घंटे बात की। तुमने बताया कि तुम Jaipur जा रहे हो, किसी दोस्त की शादी में। मैंने बताया कि मैं Bangalore वापस जा रही हूँ, टूटी हुई engagement के बाद। तुमने कहा — "कभी-कभी टूटना ज़रूरी है, ताकि सही तरीक़े से जुड़ सकें।" Flight announcement हुई। तुम उठे। मैंने number नहीं माँगा — I don't know why। शायद वो moment इतना perfect था कि मुझे डर लगा कि real life उसे ख़राब कर देगी। तुमने जाते हुए कहा — "ख़ुश रहो।" बस दो शब्द। अब हर airport पर, हर delay में, मैं Gate 14A ढूँढती हूँ। किताब पढ़ता कोई अजनबी ढूँढती हूँ। तुम्हें ढूँढती हूँ। मुझे पता है ये letter तुम तक नहीं पहुँचेगा। पर लिखना ज़रूरी था — क्योंकि कुछ लोग ज़िंदगी में बस कुछ घंटों के लिए आते हैं, और सालों का असर छोड़ जाते हैं। शुक्रिया — तीन घंटों के लिए, एक हँसी के लिए, और "ख़ुश रहो" के लिए। मैं ख़ुश हूँ। सच में। — वो लड़की, Gate 14A