साइकिल वाला लड़का
छोटा सा क़स्बा। बिजनौर, UP। हर शाम 5 बजे, एक लड़का साइकिल पर गुज़रता था — स्कूल के सामने वाली सड़क से। लाल साइकिल, स्कूल यूनिफ़ॉर्म, और बालों में हवा। प्रीति हर शाम बरामदे में बैठकर होमवर्क करती — पर 5 बजे किताब नीचे रख देती। क्योंकि वो गुज़रता था। उसका नाम क्या था — प्रीति को नहीं पता था। बस इतना पता था कि वो हर शाम आता है, और प्रीति का दिल थोड़ा तेज़ धड़कता है। एक दिन बारिश हो रही थी। प्रीति बरामदे में थी। 5 बज गए — वो नहीं आया। 5:10 — नहीं आया। 5:20 — प्रीति को बेचैनी हो रही थी। 5:30 पर — वो आया। भीगा हुआ, साइकिल के टायर में पंचर। धीरे-धीरे चल रहा था। प्रीति ने बिना सोचे अपना छाता उठाया और बाहर निकली। "ये लो," उसने कहा। लड़के ने देखा — हैरान। "ये... मेरे लिए?" "बारिश में भीगोगे तो बीमार पड़ जाओगे।" "पर तुम?" "मैं पास ही रहती हूँ। ले जाओ, कल लौटा देना।" लड़के ने छाता लिया। "शुक्रिया। मैं अमन हूँ।" "प्रीति।" अगले दिन, शाम 5 बजे — अमन आया। छाता लौटाया। साथ में एक छोटा सा गुलाब का फूल। "ये क्यों?" प्रीति ने पूछा। "कल तुम बारिश में खड़ी थीं मेरे लिए। किसी ने पहले मेरे लिए ऐसा नहीं किया।" प्रीति का चेहरा लाल हो गया। "बस एक छाता था।" "मेरे लिए बस एक छाता नहीं था।" वो सिलसिला चला — हर शाम 5 मिनट की बातचीत। सड़क के किनारे, छाते के नीचे (क्योंकि अब दोनों बहाने से छाता लाते थे)। फिर बोर्ड्स आए। अमन का परिवार दूसरे शहर चला गया। कोई फ़ोन नहीं, कोई पता नहीं। 2005 था — ना स्मार्टफ़ोन, ना सोशल मीडिया। प्रीति ने वो गुलाब का फूल किताब में सुखाकर रख लिया। आज 20 साल बाद भी — वो फूल उसी किताब में है। सूखा, रंग उड़ा हुआ, पर है। और हर शाम 5 बजे — प्रीति एक पल के लिए रुकती है। चाहे ऑफ़िस में हो, घर में हो, कहीं भी। एक पल — उस साइकिल वाले लड़के के लिए।