बेख़ुदी — नज़्म
कहते हैं नशा बुरी चीज़ है — पर तेरी बातों का नशा? वो तो ज़रूरी है। जैसे साँस ज़रूरी है, जैसे सुबह ज़रूरी है, जैसे चाय में चीनी — ज़रूरी नहीं, पर बिना उसके? बेमज़ा। तू बोलती है तो शब्द किसी orchestra की तरह बजते हैं — हर sentence एक composition, हर pause एक beat। तू हँसती है तो मैं भूल जाता हूँ कि कल की EMI भरनी है, कि boss ने डाँटा, कि दूध ख़त्म है। तू चुप होती है तो ख़ामोशी भी eloquent हो जाती है — बोलती है बिना बोले, कहती है बिना कहे। यह बेख़ुदी — यह जो हालत है — इसकी कोई दवा नहीं। और सच कहूँ? दवा चाहिए भी नहीं। बस तू बोलती रह। मैं सुनता रहूँ। बस इतना काफ़ी है — पूरी ज़िन्दगी के लिए।