फ़ेस्ट की रात
कॉलेज का सालाना फ़ेस्ट — "उत्सव"। तीन दिन का। पूरा कैंपस सजा हुआ — लाइट्स, स्टेज, स्टॉल्स।
शिवम् ने तीन साल कॉलेज में बिताए थे और एक बार भी स्टेज पर नहीं गया। Introvert था — बस बैठकर देखता था।
लेकिन इस बार उसके दोस्तों ने ज़बरदस्ती उसका नाम "ओपन माइक" में लिखवा दिया।
"बस दो मिनट, कुछ भी बोल दे," दोस्त ने कहा।
शिवम् ने सोचा — कविता सुना दूँगा। कोई पुरानी वाली।
स्टेज पर गया। लाइट आँखों में पड़ी। भीड़ दिखी — 200-300 लोग। पैर काँपे। माइक पकड़ा। चुप्पी।
तभी भीड़ में एक चेहरा दिखा — पहली रो में। एक लड़की, जो बाक़ी सब से अलग — चिल्ला नहीं रही थी, बस मुस्कुरा रही थी। जैसे कह रही हो — "बोलो, मैं सुन रही हूँ।"
शिवम् ने आँखें उस पर टिकाईं। और बोलना शुरू किया — कोई पुरानी कविता नहीं, बल्कि जो दिल में था वो:
"मैं वो लड़का हूँ जो कभी कुछ नहीं कहता,
जो कोने में बैठकर सबको देखता है,
जो शब्द लिखता है पर बोल नहीं पाता,
पर आज... आज एक चेहरा दिखा है,
जिसने बिना कुछ कहे, मुझे बोलना सिखा दिया।"
तालियाँ बजीं। पर शिवम् को बस एक चीज़ दिखी — वो लड़की खड़ी होकर ताली बजा रही थी।
स्टेज से उतरा। वो लड़की सामने आई।
"अच्छा बोला।"
"शुक्रिया। तुम्हारी वजह से बोल पाया।"
"मैंने क्या किया?"
"मुस्कुराई। बस।"
उसका नाम निकिता था। थिएटर सोसायटी में थी। शिवम् लिटरेरी क्लब में। दोनों में एक बात कॉमन थी — दोनों शब्दों से प्यार करते थे। बस एक बोलकर, एक लिखकर।
फ़ेस्ट ख़त्म हुआ। पर दोनों का सिलसिला शुरू हो गया। शिवम् ने निकिता के लिए कविताएँ लिखीं, निकिता ने उन्हें स्टेज पर परफ़ॉर्म किया।
फ़ाइनल ईयर में, कॉलेज के आख़िरी "उत्सव" में — शिवम् ने एक बार फिर स्टेज पकड़ा। इस बार पैर नहीं काँपे।
"तीन साल पहले, इसी स्टेज पर, मैं एक लड़की को देखकर बोलना सीखा। आज उसी लड़की से कहना चाहता हूँ — will you marry me?"
निकिता भीड़ में खड़ी थी। रो रही थी और हँस रही थी — एक साथ।
"हाँ, बुद्धू। हज़ार बार हाँ।"