मेरे प्रिय को — जो अभी दूर है
प्रिय, आज फिर तुम्हारी बहुत याद आई। सुबह चाय बनाते वक़्त — तुम्हारी "थोड़ी और चीनी डालो" की आवाज़ कानों में गूँजी। बालकनी में खड़ी थी — तुम्हारी वो आदत याद आई, सुबह-सुबह नंगे पैर बालकनी में आकर आँखें मलते हुए कहना, "आज मौसम अच्छा है।" चाहे धूप हो, बारिश हो, या कोहरा — तुम्हारे लिए हर मौसम अच्छा होता था। मुझे तुम्हारे वो छोटे-छोटे काम याद आते हैं — रात को सोने से पहले मेरे लिए पानी का गिलास रखना। बिना पूछे मेरा फ़ोन चार्ज पर लगा देना। मेरे माथे पर बाल हटाते हुए कहना, "बहुत सोचती हो, सो जाओ।" लॉन्ग डिस्टेंस मुश्किल है। बहुत मुश्किल। कभी-कभी रात को लगता है — बस एक बार गले लग जाऊँ, सब ठीक हो जाएगा। वीडियो कॉल पर तुम्हें देखती हूँ तो एक पल को ख़ुशी होती है, फिर कॉल कटने पर और ज़्यादा खालीपन। पर जानते हो — मुझे तुम पर भरोसा है। हम पर भरोसा है। ये दूरी अस्थायी है, पर जो हमारे बीच है — वो स्थायी है। तुम जल्दी आओ। तुम्हारे बिना ये घर, घर नहीं लगता। बस चार दीवारें हैं। तुम आओगे तो फिर से घर बनेगा। तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। इतना कि शब्दों में नहीं कह सकती। पर ये ख़त एक कोशिश है। जल्दी आना। हमेशा तुम्हारी, सिर्फ़ तुम्हारी।